10 February 2014

तेरा हर लफ्ज़

तेरा हर लफ्ज़ मेरी रूह को छूकर निकलता है.
तू पत्थर को भी छू ले तो बाँसुरी का स्वर निकलता है.

कमाई उम्र भर कि और क्या है, बस यही तो है
में जिस दिल में भी देखूं वो ही मेरा घर निकलता है.

मैं मंदिर नहीं जाता मैं मस्जिद भी नही जाता
मगर जिस दर पर झुक जाऊं वो तेरा दर निकलता है

ज़माना कोशिशें तो लाख करता है डराने की
तुझे जब याद करता हूँ तो सारा दर निकलता है.


दिल ही दिल में मुहब्बत करती हो


आँखों से मीठी शरारत करती हो तुम
दिल ही दिल में मुहब्बत करती हो तुम
इक़रार करती नहीं इन्कार करती नहीं
फिर क्यों मुस्कुराया करती हो तुम
छुआ नज़रों ने जब तुझे पहली बार
तीरे-नज़र तेरा हुआ दिल के पार
रब से और कुछ माँगा नहीं माँगा तेरा दीदार
झूठ ही कह दो करती हो प्यार
कर लूँ तेरा एतबार…

चाँद से चेहरे वाली तेरी ज़ुल्फ़ें हैं रात
होती नहीं कभी तेरी-मेरी मुलाक़ात
कोई तो बहाना हो मेरा तुझसे मिल पाना हो
चाँदनी हो जाये मेरी हर रात
हो जाये तेरी-मेरी मुलाक़ात…

आँखों से मीठी शरारत करती हो तुम
दिल ही दिल में मुहब्बत करती हो तुम
तुम्हें कहना तो होगा कहती नहीं हो
वह क्या बात है ..जिससे डरती हो तुम


zindagi...



Chaahat











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